मत काटो मुझको हे मानव ,
मैं तो तेरा जीवनदायक ,
सदियों से मैं यहाँ खड़ा ,
देखो मेरा बड़ा तना,
आता तेरे बड़े काम मैं
कुछ न माँगता, कुछ न चाहता
हरपल तुझको श्वासें देता ,
भोजन देता ,देता औषधि
पक्षियों को आश्रय देता
पंथियों को देता छाया
अपना सब देता तुझ पर वार
पर, हे लालची मानव !
अब तक तुझे समझ न पाया
मैं तेरा लालच रोक न पाया
तेरा लालच किसे बताऊँ ,
अपनी व्यथा मैं किसे सुनाऊँ
जब रक्षक ही बन जाए भक्षक
अब तू ही बतला दे मानव
अपने -आप को कैसे बचाऊँ|
लेना मुझे नहीं आता है
मुझको भाता केवल देना ,
गन्दी वायु तुझसे लेता
शुद्ध करके , तुझको ही देता
बाढ़ रोकता ,लाता बरखा
रैन-बसेरा करते मुझमें,
तोता,कोयल-कौआ ,मोर
बेजुबान प्राणी भी जाने
हे निर्मोही मेरा मोल
पर,केवल पैसे से ही तोले
तू व्यापारी मेरा मोल |
लील गया जंगल सारे ही
नदियाँ दूषित कर डालीं
करके तूने पाप बहुतेरे
गंगा में ही धो डाले |
प्रतिदिन करता पाप तू इतने,
बढ़ते नितप्रति सुरसा मुख से |
तू अज्ञानी नहीं है मानव !
मैं भी जानूँ तू भी जाने
पर अपने बढ़ते लालच को
हे मानव तू रोक न पाया |
गंगा रोई खूब बिलखकर
शिव ने भी रौद्र रूप दिखाया
अक्सर कंपन कर धरा ने
हे मानव ! तुझको चेताया |
हे निर्लज्जी ,हे मूढ़मति
तेरी समझ में कुछ न आया
तुझको तो केवल ,बस केवल ,
और केवल लालच है भाया|
अब भी जागो ,अब भी चेतो
लालच पर कस लो लगाम
पाँचों तत्व तुम्हारे ही हैं
होता तुममें इनका वास
इसीलिए चेताता तुमको
जागो हे मनु संतान
मेरा वंश बढ़ा हे मानव
पौधरोपण
कर अभी ,
सुधर जायेंगी पीढ़ी तेरी
स्वस्थ रहेंगी सदा सुखी |
विनती करता पुनः मैं तुझसे ,
मत काटो मुझको हे मानव
मैं तो तेरा जीवनदायक |
नीरा भार्गव
वृक्ष हमारी प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, हमारे जीवन की परम आवश्यकता भी हैं | मनुष्यों का ही नहीं ,अपितु समस्त प्राणियों का जीवन वृक्षों पर ही निर्भर है | मनुष्य अपने लालच के लिए इस अमूल्य धरोहर को नष्ट किये जा रहा है| वृक्षों को बचाने के लिए निवेदन करती मेरी यह कविता |
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