Saturday, 4 February 2017

वर्तमान समय में बढती जनसंख्या और घटते जंगलों के कारण वानरों के घर छिनते जा रहे हैं |यह बहुत दुःख की बात एवं गंभीर समस्या है| वानरों की यह खीज सोसाइटी में उनके आने से दिखाई देती है | जब वे अनजाने में पेट की क्षुधा की शांति हेतु नगरों में घुस आते हैं और भोजन के बजाय उन्हें खाने पड़ते हैं डंडे | कपि समाज के अंतर्मन की व्यथा को कविता के माध्यम से व्यक्त किया गया है |

कपि की व्यथा

मैंने तुम्हारा क्या था बिगाड़ा,
जो तुमने हमारा घर है उजाड़ा ,
न भूलो !
कभी हम ही थे तुम्हारे पूर्वज
आज भी पूजते हो तुम अंजनी नंदन |
भटकते हैं हम आज हो यूँ बेघर  
बनाया जहाँ तुमने अपना आशियाना
भूले-भटके जब आते थे दर तुम्हारे
मानते थे तुम कि घर आज
स्वयं मारुति नंदन पधारे
करते थे तुम भव्य स्वागत हमारा
खिलाते  थे केला ,चना औ सिंगीदाना
डरते थे हम भी दर पे आने से तुम्हारे
भय था हमें भी कि बाँध हमें
कोई मदारी न नचा ले ,
पर , अब तेरे इस शहर में
रहते  हैं अनगिनत  मदारी
हमें देखते ही उठाते हैं पत्थर
न करते तनिक भी वे चिंता हमारी
हम विचरते हैं भूखे
पर भूख न मिटी तुम्हारी
काट डाले सारे जंगल
बसा दी कंक्रीट की नगरी
हर वक्त कहते हो आतंक है हमारा
हमारा क्या दोष है, कभी तुमने विचारा
तेरी इस भूख ने ही हे! मानव
प्रकृति के संतुलन को  बिगाड़ा
तुमने हमारा घर क्यों उजाड़ा ?
 हे! मानव
तुमने हमारा घर क्यों उजाड़ा ?

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