आ गौरैया
आ गौरैया मेरे आँगन |
आँगन !!!!!!! कैसा आँगन ?
दसवीं मंजिल पर घर मेरा ,
बड़ी बालकनी में तू डाल ले डेरा ,
कुछ गमलों से रोशन मेरी बगिया
इनके ही पीछे तू बसा
ले अपनी दुनिया |
दाना-पानी मैं दे दूंगी ,
बच्चे तेरे मैं पालूंगी ,
बस तू वापस आ जा .....मेरी सोन चिरैया |
बचपन की यादों में तू चहके ,
तेरे कलरव से मन महके ,
तू तो रची-बसी यादों में ,
तू बस अपनी झलक दिखा जा |
यूँ मत रूठे मेरी रानी ,
आ जा मेरी चुन-चुन चिड़िया
माना , अब आँगन हैं छूटे
न तस्वीरों के पीछे तेरा घर ,
फिर भी मन के कोने में
लगा है तेरा आना-जाना
तू चाहे तो लटके गमलों में ,
या फिर कृत्रिम घोंसले भीतर
सजा ले अपनी दुनिया सुंदर |
तू ही सबको खुशियाँ बाँटे,
आ गौरैया मेरे आँगन
फिर से भर दे जीवन में रंग |
विलुप्त होती गौरैया को बचाने हेतु संदेश देती मेरी यह छोटी सी कविता |पसंद आए तो like जरूर कीजिए |
ReplyDeleteधन्यवाद
नीरा भार्गव 'नीर'
'नीर'क्षीर करके पृथक , दिया ये वक्तव्य है।
ReplyDeleteगौरैया को न होने देंगी, कवयित्री! विलुप्त है।